सरहद पर मरने वालों
तुम्हे मेरा सलाम
२६ जुलाई, १९९९ को हमारे देश के सिपाहियों ने कारगिल का युद्ध
जीतकर सीमा पर फिर से भारत का तिरंगा फहराया था। पुरे देश में खुसी
की लहर थी। पर हर घर में नहीं। किसी के पिता, किसी का बेटा, भाई इस
युद्ध में शहीद हो गए थे। देश ने अपने ५२७ जवान खो दिए थे। बस इसी
पर में एक कविता प्रस्तुत करता हूँ :-
सरहद पर मरने वालों,
तुम्हे मेरा सलाम,
करते हो तुम इस मुल्क की हिफाजत,
अपनों से दूर रहकर हर पल,
चाहे वो हिमालय का पर्वत हो,
या राजस्थान का रेगिस्तान।
जिन मुश्किलों पर हम मुस्कुरा नहीं सकते,
उन राहो पर तुम हस्ते चले,
जिन राहो की कोई मंजिल न थी,
उन राहो पर तुम सीना तने चले,
जब मुश्किलें खड़ी थी चट्टान सी बड़ी,
वहां तुम तूफान बनकर आगे बड़े।
यहाँ हम माना रहे थे रमजान और दीवाली,
वहाँ तुम खेल रहे थे खून की होली।
यह खड़ा हिमालय बता रहा,
तुम डरे न आँधी पानी से,
डेट रहे अपने पथ पर,
सब कठिनाई तूफानी से।
तुम सीखा गए इस वतन के बच्चों को,
जिसकी जुबान पर एके ही बात है,
नन्हा मुन्ना रही हूँ, मैं इस देश का सिपाही हूँ।
आज इस देश के नौजवान के दिल में,
एक ही बात गूंज रही है,
दिल दिया है, जान भी देंगे,
ओ वतन तेरे लिए।
तुम्हारी शाहदत ने,
न जाने कैसा जोश भरा हम सब में,
तुम ५०० शहीद हुए,
हम १००० सैनिक बने।
बहुत सुनते आए थे ग़ांधी के बारे में,
आब भगत सिंह को दिखने की बारी है।
ऐसे थी तुम्हारी शहादत,
यह देश याद रखेगा हर दशक तक,
नहीं थे तुम किसी धर्म के,
सब संतान थे भारत माता कीं,
शहादत से चुकाया तुमने अपनी माता का कर्ज था,
यह तो तुम्हारा धरम था,
निभाया तुमने अपना कर्तव्य था,
इसकी खातिर जीना मारना,
यही तो है भारतीय सिपाही की पहचान।
सीखा गए तुम इस वतन को,
हम एक थे और एक है,
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई,
सब है भारत माता की संतान।
मेरे देश के वीर जवानो तुमने,
सुभाष के उस प्रश्न का उत्तर दिया,
जिसने कहा था,
वो खून किस मतलब का,
जिसमें उबाल का नाम नहीं,
वो खून किस मतलब का,
जिसमें देश का नाम नहीं।
कह गए तुम अपनी क़ुरबानी से यह,
भारत - जननी का मान किया,
बलिबेदी पर बलिदान किया,
अपना पूरा अरमान किया,
अपने को भी कुर्बान किया,
सरहद पर मरने वालों,
तुम्हे मेरा सलाम,
तुम्हे मेरा सलाम,
जय हिंदुस्तान। जय हिंदुस्तान। जय हिंदुस्तान। जय हिंदुस्तान।